गुरुवार, 9 जुलाई 2020

नई कविता :- कोरोना और अर्थव्यवस्था ( उदय राज की नई कविता :- 11 ) ✍️

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 udayrajpoems.blogspot.com

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                शीर्षक :- कोरोना और अर्थव्यवस्था



       
 इस कोरोना काल में
लोकडाऊन की पुकार में
हर व्यवस्था पर संकट का विकराल पड़ गया
चलती - फिरती -दौड़ती अर्थव्यवस्था पर
यू ही एका एक अकाल पड़ गया
हर आदमी जो हैं इस अर्थव्यवस्था
का हिस्सेदार और भागीदार
उसकी भागीदारी और हिस्सेदारी का
सत्या नशा हो गया
बात करें चाहे दुकानदार की , नॉकरी वाले ,रेडी - पटरी वाले या फिर अपने मजदूरों की
हर आदमी की जिंदगी पर
ऐसा प्रहार पड़ गया , की
उसकी सामाजिक - आर्थिक जिंदगी पर
कोरोना का वार पड़ गया
इस कोरोना काल मे , लोकडाऊन की पुकारा में
हर व्यवथा पर  संकट का विकराल पड़ गया
चलती - फिरती-दौड़ती अर्थव्यवस्था पर
यू ही एका एक अकाल पड़ गया ।



इस कोरोना काल मे
अर्थव्यवस्था में हुए अकाल ने
लोगों को गरीब , तो गरीबो को
और गरीब कर दिया
मजदूरों को और मजबूर तो
उनकी जिंदगी को और दुखों से भर दिया
दुकान दरों को दुकानों से घरों पर
बैठा दिया , तो उन पर
दुकान के किराए का पहाड़ लाद दिया
इस तरह हर आदमी की जिंदगी हैं
प्रभावित इस कोरोना से
मैं बात करूं , किस - किस की
कहूंगा बस इतना कि
इस संकट के काल मे
हर भेदभाव और नफरतों को
यू ही मिटा के
दो तुम अपने और पराये को भी
सहयोग और साथ
ताकि सभी को यहाँ लगें की
इस संकट के काल मे भी
हम हैं , अपनों के साथ
हम हैं , अपनों के साथ
और इस तरह हम दिखाये
सब को भाई चारे की एक नई मिशल ।

इस कोरोना काल मे ,
लोकडाऊन की पुकार में
हर व्यवस्था पर संकट का विकराल पड़ गया
चलती - फिरती- दौड़ती अर्थव्यवस्था पर
यू ही एका एक अकाल पड़ गया ।


             उदय राज ( ✍️ )

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